लक्ष्य साधना
ढल जाती चंदा की किरने
छिप जाता सूरज उस पार
आते जाते बदलते मौसम
कर जाते बातें दो चार
भूली बिसरी चंद उम्मीदें
उमड़ कर आती है चुपचाप
जैसे पूनम की रजनी में
शांत सागर से उठे ज्वार
मन आँगन में होता अंकुरित
कोलाहल कर सुप्त विचार
पल्लवित होंगी सब उम्मीदें
आश का सजता वन्दनवार
धरा लगे तब केसर क्यारी
छा जाता सौरभ चहुँ और
लेकर श्रम कुठार हाथों में
बढ़ें कदम लक्ष्य की ओर
पूरन होतें है जब सपनें
गुंजित होता मेघ मल्लहार
झूमे 'नीरज ' जीवन ताल में
छू जाता जब बसंत बयार
शुक्रवार, 7 जनवरी 2011
बुधवार, 5 जनवरी 2011
shaayad tum aaye ho
शायद तुम आये हो
शाख पर कोंपल फूटी नई
सोचा शायद तुम आये हो
मंद बही पुरवाई कहीं
सोचा शायद तुम आये हो
धड़का दिल मैं, चुपचाप रही
सोचा शायद तुम आये हो
थिरका पग नस में चुभन हुई
सोचा शायद तुम आये हो
झांक रहा सुधियों का अम्बर
बाट देखता जर्रा-जर्रा
सोते जगते आठों प्रहर
लगता है जैसे तुम आये हो
शाख पर कोंपल फूटी नई
सोचा शायद तुम आये हो
मंद बही पुरवाई कहीं
सोचा शायद तुम आये हो
धड़का दिल मैं, चुपचाप रही
सोचा शायद तुम आये हो
थिरका पग नस में चुभन हुई
सोचा शायद तुम आये हो
झांक रहा सुधियों का अम्बर
बाट देखता जर्रा-जर्रा
सोते जगते आठों प्रहर
लगता है जैसे तुम आये हो
Iltiza
इल्तिजा
"बहुत अच्छे लगते हो तुम इस दिल को "
यह बात बहुत पहले से ही जानते थे हम
पर देख सिलवटे परेशानी की पेशानी पर तेरी
तड़प उठेगा दिल यह भी
इस का कभी एहसास ना था
छू लिया जब हमने तेरे जजबो को
उन सर्द शामो में
सर्द हो जायेंगे दिल के शोले मेरे भी
इस बात का आभास ना था
है इल्तिजा अब उस गर्म हवा से जो करती है हैरान तुझे
भूले से भी ना गुज़रे छू कर कभी दामन तुम्हारा
गर्मी हम से झेली जाएगी उन बिगड़ी हवाओं की
ना झेला जाएगा हम से
इस दिल का दर्द दोबारा
"बहुत अच्छे लगते हो तुम इस दिल को "
यह बात बहुत पहले से ही जानते थे हम
पर देख सिलवटे परेशानी की पेशानी पर तेरी
तड़प उठेगा दिल यह भी
इस का कभी एहसास ना था
छू लिया जब हमने तेरे जजबो को
उन सर्द शामो में
सर्द हो जायेंगे दिल के शोले मेरे भी
इस बात का आभास ना था
है इल्तिजा अब उस गर्म हवा से जो करती है हैरान तुझे
भूले से भी ना गुज़रे छू कर कभी दामन तुम्हारा
गर्मी हम से झेली जाएगी उन बिगड़ी हवाओं की
ना झेला जाएगा हम से
इस दिल का दर्द दोबारा
मंगलवार, 4 जनवरी 2011
hansi
हंसी
गर हँसना निर्भर करता है किसी घटना पर
तो हंसी वाकई बिकती है बाजारों में
गर हँसना निर्भर करता है सम्मलेन पर
तो हंसी वाकई मिलती है त्योहारों पर
हंसी के बदले गर तुम्हे ना मिले हंसी
तो समझ लो तुम भी शामिल हो खरीदारों में
हँसना तो एक आदत है जो शुमार हो जीवन में
हँसना इबादत है जिसका एह्त्माद हो जन मन में
गर हँसना निर्भर करता है किसी घटना पर
तो हंसी वाकई बिकती है बाजारों में
गर हँसना निर्भर करता है सम्मलेन पर
तो हंसी वाकई मिलती है त्योहारों पर
हंसी के बदले गर तुम्हे ना मिले हंसी
तो समझ लो तुम भी शामिल हो खरीदारों में
हँसना तो एक आदत है जो शुमार हो जीवन में
हँसना इबादत है जिसका एह्त्माद हो जन मन में
sankuchit yaad
संकुचित याद
बहुत याद करने पर भी ना जब आया याद वो
सोचा, छोड़ो शायद इक अजनबी सा था वो
अच्छा ही हुआ चलो भूल सा गया वो
याद आता भी भी तो ना तड़पाता जी को
हमसाया बन कर मेरा जब साथ मेरे चला वो
याद बन कर एक अपना, बहुत याद आया वो
आता जब भी इक पवन की तरह
यादो की बगिया महका जाता वो
सोचते है याद भी कितनी संकुचित है
चुनती है उसको जो बहला जाता है जी को
बहुत याद करने पर भी ना जब आया याद वो
सोचा, छोड़ो शायद इक अजनबी सा था वो
अच्छा ही हुआ चलो भूल सा गया वो
याद आता भी भी तो ना तड़पाता जी को
हमसाया बन कर मेरा जब साथ मेरे चला वो
याद बन कर एक अपना, बहुत याद आया वो
आता जब भी इक पवन की तरह
यादो की बगिया महका जाता वो
सोचते है याद भी कितनी संकुचित है
चुनती है उसको जो बहला जाता है जी को
aadmi ka vartmaan
आदमी का वर्तमान
वक़्त की दौड़ में अँधा हुआ जाता है आदमी
कुछ पाने की चाह में सब खोता जाता है आदमी
बंद मुट्ठी में रेत की तरह फिसलता ही रहा
हाथो से पानी को पकड़ना चाहता है आदमी
जिंदगी के मरहले ना लौट कर आयेंगे कभी
याद बन रह जाएँ , स्वप्पन मिट जाएँ सभी
उजली कोरी कल्पनाएँ धूसरित हो जायेंगी
धूल के बिखरे कणों में 'अपना कल' बटोरता आदमी
वक़्त की दौड़ में अँधा हुआ जाता है आदमी
कुछ पाने की चाह में सब खोता जाता है आदमी
बंद मुट्ठी में रेत की तरह फिसलता ही रहा
हाथो से पानी को पकड़ना चाहता है आदमी
जिंदगी के मरहले ना लौट कर आयेंगे कभी
याद बन रह जाएँ , स्वप्पन मिट जाएँ सभी
उजली कोरी कल्पनाएँ धूसरित हो जायेंगी
धूल के बिखरे कणों में 'अपना कल' बटोरता आदमी
शनिवार, 1 जनवरी 2011
maun shabad ragini
मौन शब्द रागिनी
शब्दों की जब मौन रागिनी
चेतन में गुंजित होती है
भावो की अविरल धारा
जन-मन को सिंचित करती है
प्यार भरा मन का नंदनवन
कुसुमित हो मुस्काता है
मधु चंदा का सहज स्पर्श
स्नेह सुधा बरसाता है
तेज ताप सूरज का मद्धम
भाव ज्वार को करे नियंत्रित
तरु पल्लव शाखावालियों पर
नव कोंपल फूटे हो अंकुरित
शब्दों की जब मौन रागिनी
चेतन में गुंजित होती है
भावो की अविरल धारा
जन-मन को सिंचित करती है
प्यार भरा मन का नंदनवन
कुसुमित हो मुस्काता है
मधु चंदा का सहज स्पर्श
स्नेह सुधा बरसाता है
तेज ताप सूरज का मद्धम
भाव ज्वार को करे नियंत्रित
तरु पल्लव शाखावालियों पर
नव कोंपल फूटे हो अंकुरित
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