शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

lakshya saadhna

 लक्ष्य साधना

ढल जाती चंदा की किरने
छिप जाता सूरज उस पार
आते जाते बदलते मौसम
कर जाते बातें दो चार
भूली बिसरी चंद उम्मीदें
उमड़ कर आती है चुपचाप
जैसे पूनम की रजनी में
शांत सागर से उठे ज्वार
मन आँगन में होता  अंकुरित
कोलाहल कर  सुप्त विचार
पल्लवित होंगी सब उम्मीदें
आश  का सजता वन्दनवार
धरा लगे तब केसर क्यारी
छा जाता सौरभ  चहुँ और
लेकर श्रम कुठार हाथों में
बढ़ें   कदम   लक्ष्य की ओर
पूरन होतें है जब सपनें
गुंजित होता मेघ मल्लहार
झूमे 'नीरज '  जीवन ताल में
छू जाता जब बसंत बयार

बुधवार, 5 जनवरी 2011

shaayad tum aaye ho

शायद तुम आये हो

शाख पर कोंपल फूटी नई
सोचा शायद तुम आये हो
मंद बही पुरवाई कहीं
सोचा शायद तुम आये हो
धड़का दिल मैं, चुपचाप रही
सोचा शायद तुम आये हो
थिरका पग नस में चुभन हुई
सोचा शायद तुम आये हो
झांक रहा सुधियों का अम्बर
बाट देखता जर्रा-जर्रा
सोते जगते आठों प्रहर
लगता है जैसे तुम आये हो

Iltiza

इल्तिजा

"बहुत अच्छे लगते हो तुम  इस दिल को  "
यह बात बहुत  पहले से ही जानते थे हम
पर देख सिलवटे परेशानी की  पेशानी पर तेरी
तड़प उठेगा दिल यह भी
इस का कभी एहसास ना था
छू लिया जब हमने तेरे जजबो को
उन सर्द शामो में
सर्द हो  जायेंगे  दिल के शोले  मेरे भी
इस बात का आभास ना था
है  इल्तिजा  अब उस गर्म हवा से  जो करती है हैरान तुझे
भूले से भी ना गुज़रे  छू कर कभी  दामन तुम्हारा
गर्मी हम से झेली जाएगी उन बिगड़ी हवाओं की
ना झेला जाएगा  हम से
इस दिल का दर्द दोबारा

मंगलवार, 4 जनवरी 2011

hansi

हंसी

गर हँसना निर्भर करता है किसी घटना पर
तो हंसी वाकई बिकती है बाजारों में
गर हँसना निर्भर करता है सम्मलेन पर
तो हंसी  वाकई मिलती है त्योहारों  पर
हंसी के बदले गर तुम्हे ना मिले हंसी
तो समझ लो तुम भी शामिल हो खरीदारों में
हँसना तो एक  आदत है जो शुमार हो जीवन में
हँसना  इबादत है जिसका एह्त्माद हो जन मन  में

sankuchit yaad

संकुचित याद

बहुत याद करने पर भी ना जब आया याद  वो
सोचा, छोड़ो शायद इक  अजनबी सा  था वो
अच्छा ही हुआ चलो भूल सा गया  वो
याद आता भी भी तो ना तड़पाता जी को
हमसाया बन कर मेरा जब साथ मेरे चला वो
याद बन कर एक  अपना, बहुत याद आया वो
आता जब भी  इक पवन की तरह
यादो की बगिया महका जाता वो
सोचते है याद भी कितनी संकुचित है
चुनती है उसको जो बहला  जाता है जी को

aadmi ka vartmaan

आदमी का वर्तमान

वक़्त की दौड़ में अँधा हुआ जाता है आदमी
कुछ  पाने की चाह में सब  खोता जाता है आदमी
बंद मुट्ठी  में रेत की तरह फिसलता ही रहा
हाथो से पानी को पकड़ना चाहता है  आदमी
जिंदगी के मरहले ना लौट कर आयेंगे कभी
याद बन  रह जाएँ , स्वप्पन मिट जाएँ सभी
उजली कोरी  कल्पनाएँ धूसरित हो जायेंगी
धूल के बिखरे कणों में 'अपना कल' बटोरता आदमी

शनिवार, 1 जनवरी 2011

maun shabad ragini

मौन शब्द रागिनी

शब्दों की जब मौन रागिनी
चेतन में  गुंजित होती है
भावो की अविरल धारा
जन-मन को सिंचित करती है
प्यार भरा मन का नंदनवन
कुसुमित हो मुस्काता है
मधु चंदा  का सहज स्पर्श
स्नेह सुधा बरसाता है
तेज ताप सूरज का मद्धम
भाव ज्वार को करे नियंत्रित
तरु पल्लव शाखावालियों पर
नव कोंपल फूटे हो अंकुरित