शुक्रवार, 11 मार्च 2011

Ireshya

ईर्ष्या 
मुरझाता सुंदर कोमल मन
प्रज्जवलित हो जब इर्ष्या दाह
भस्म हुए जाते सब अवयव
कसमसाती सी बचती आह

कलरव बन जाता कोलाहल 
वाचाल  शब्द हो जाते मौन 
जीवन पीयूष बने हलाहल 
चेतनता हो जाती गौण 

ओ' पीड़ा की मृग नयनी 
निज निवास में तेरा  वास 
उथल पुथल कर देता जग को 
आश्रित हो जब आती पास  

Thaakur ka Rang

ठाकुर का रंग

हरा लाल न नीला पीला
रंग है मेरा स्नेह सिक्त
  सराबोर हो जो इस रंग में
दुखो से हो जीवन रिक्त
 कहते जब  चुपके कानो में
गुंजित होती है झंकार
सूने मन के आँगन में
छा जाती इक मधु बयार
भावों की गीली माटी पर
आशा  के गिरते बीज नए
अंकुरित होता है नवचेतन
पुष्पित हो जाते  स्वप्पन नए
धूमिल,धूसरित अचेतन भी तब
सजाने  लगता वंदन वार
कुम्लाया मुरझाया जीवन
जीने को हो पुनह ; तैयार
विश्व विदित इतिहास लिखा है
जीते हारा विश्व जंग
कण कण में चढ़ता साहस भरता
ऐसा मेरे ठाकुर का रंग

बुधवार, 9 मार्च 2011

bekal intzaar

 बेकल  इंतजार 

और सन्नाटा सो  गया   रोते रोते 
दिनभर थी उसको बस एक ही ललक
बीते  गा दिन होगी फिर  शाम 
तय कर लम्बा इंतज़ार 
आयेंगे पथ पर वो जिन्हें 
तकती थी निगाहें अपलक 
उफ़ ! बीता न दिन, ना हुई शाम 
जुग जैसे बीता हर पल 
करने को सांझी  तन्हाई 
जीता रहा  हर क्षण खोते खोते 
और सन्नाटा सो गया रोते रोते
दिन गुज़र गये, बीत गयी सदियाँ 
तलाश में उसकी ,बीत गयी घड़ियाँ 
जीवन की हो गयी शाम
वक़्त की सुबह ढोते ढोते 
और सन्नाटा सो गया रोते रोते

मंगलवार, 8 मार्च 2011

Mahila divas

 महिला दिवस 

मैं भगवान् का शुक्रिया अदा करती हूँ कि मुझे मानव जीवन मिला . और शुक्रिया अदा करती हूँ कि उसने मुझे नारी रूप दे कर इस जग में भेजा . मुझे गर्व है अपने नारीत्व पर .............

आज इस महिला दिवस पर मेरी हर एक महिला को शुभ कामनाएं है कि उसके दिल में अपने नारी होने का गर्व हो 
और हर उस पुरुष को जो इस भावना को सम्मानित और स्थापित करे .
हर दिन महिला दिवस के उल्लास और उत्साह जैसे हो

सोमवार, 7 मार्च 2011

mera parichay

मेरा परिचय 

क्या कहते हो 
एक फक्कड़ फकीर हूँ मैं 
यां  विधाता की लिखी 
एक अजब तक़दीर हूँ मैं 
देख पायो तो देखो 
मेरी आँखों की चमक 
हो जाये गी धुंधली 
तेरे पैसे की खनक 
लबो पे छिपी 
मुस्कराहट को देख
मिट जाये गी 
माथे पर खिंची चिंत रेख 
भीड़ में रह कर भी 
 तुम फिरते हो अकेले 
और मैं  !रह कर भी अकेला
जमा कर लेता हूँ  एक मेला 
संतोष की चादर में लिपटा
एक ऐसा बाशिंदा हूँ 
सब कुछ खो कर भी 
हूँ खजानो से भरा

रविवार, 6 मार्च 2011

mahtvaankankhsaa

 मह्त्वांकंक्षा

उन नन्ही झील सी आँखों में 
तैरा करते थे स्वप्पन कभी 
उन फूल से नाज़ुक ओंठो पर 
अठखेली करता था हास्य कभी 

वह  नन्हे पावों की थिरकन 
नृत्य जहां होता नतमस्तक 
वह मधुर कंठ वह तान राग 
संगीत जहां खुद देता दस्तक 

लुप्त हुए सब जीने के ढंग 
हो  गये फीके  जीवन के रंग 
मह्तावान्क्षा कुछ कर पाने की 
छोड़ गयी मौलिकता के रंग 

भूला बचपन खुद अपना बचपन 
तजा जवानी ने निज यौवन
बिसरी तरुणों ने तरुणाई
हुआ बुढापा विकल और अनमन

आश निराश  के झूले निस दिन 
जीवन अब झूला करता है 
हार जीत  की असमंजसता में 
पल प्रति पल पीड़ित रहता है

गुरुवार, 3 मार्च 2011

faansle aur milan ka ehsaas

  फांसले और मिलन का एहसास

क्या दिल जाने क्या है अपना 
जब तक रहा वो दूर  हम से
करता था उसको पाने की तमन्ना 
और आज जब वो है पास दिल के 
तो ढूँढता है फांसले 
चाह कर भी चाह न सका 
पा कर भी पा न सका 
मिट गये सब फांसले जब 
तो पास आ कर भी समा न  सका 
सच है दूरी हमेशा तड्पाती है 
  मिलन इस  एहसास को ठंडा कर जाती है  
सदियों रहें यह  फांसले  जुग जुग जिए यह फांसले 
यह फांसले ही है जो   कराते है 
हर मिलन का एहसास