शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

Janta!!

जनता !!
यह सच है
कि जनता बहुत  ताकत वर है
जब भी चाहे किसी का भी तख्ता पलट सकती है
जनता ने हज़ारों राज बदले है
यह भी सत्य है कि
जनता रूक नहीं सकती
कि जनता झुक नहीं सकती
कभी भी
लेकिन यह भी सत्य है
कि जनता सोच नहीं सकती
गर सोच लिया होता तो
इतना भ्रष्टाचार कैसे सहन करती
करती क्यों इंतजार
किसी ७४ वर्षीय अन्ना हजारे का
एका एक इतना विरोध भ्रष्ट चार का ?
क्या सुप्त था कोई
क्या अब रुष्ट है कोई
क्या नहीं मिलता अपना भाग
इस जुल्म के किनारे  का ?
छोड़ो भेडचाल अब जनता
वास्तविकता में आओ तुम
खुद बनी  इस तंत्र की हिस्सा
खुद अपनी मुश्किल सुलझाओ तुम
क्यों करती हो आगाज़ किसी नेता का
कब तक झेलो गी नेता के अभिनेता का
सोचो समझो और करो फिर आन्दोलन
वरना आने वाला उपहास करेगा जन तन मन



रविवार, 7 अगस्त 2011

rhe slaamat dost


रहे सलामत दोस्त ! 
 
मिल कर तुमसे यह एहसास हुआ
कि जीवन में कितनी प्यास है 
हर दम जो टीसता रहता था 
अब उस  दर्द में मिठास है 
लेता रहता था जो हिसाब 
हरदम अपने गुनाहों का 
करता रहता  था फ़रियाद 
अपनी पनाहों का 
मिल कर तुमसे जान लिया 
कि तू ही मेरी इबादत है 
किया था  जिस दिन का इंतज़ार 
आज वही आयी  कयामत है 
 बहुत  अच्छे हो तुम और 
तुम्हारी  दोस्ती भी अच्छी 
करूं क्या ज़िक्र मैं उसका 
तुम्हारी फितरतें भी अच्छी 
करूं मैं उस घड़ी का साधुवाद 
जब तुमसे मिलना था 
ना था रिश्ता कोई फिर भी 
हमारा साथ जुड़ना था 
 जिया हूँ चंद लम्हों  के साथ 
मैं इक युग भरा जीवन 
करूं महसूस मैं संपूरण
कभी था एक अधूरा मन 
रुखसत हुये  जहान से
तो कोई गम नहीं होगा 
पलकें चैन से मुंद जायेंगी 
कोई भी जख्म  नहीं होगा 
रहे सलामत दोस्त और 
यह दोस्ती तेरी 
बदल डाली जिसने यह 
सारी  तक़रीर ही  मेरी  






शनिवार, 6 अगस्त 2011

Dost ki dosti

दोस्त की दोस्ती !

जुदा हूँ दोस्तों से  पर दोस्ती से नहीं
ऐसा यह खजाना है जिसकी कीमत कोई नहीं
दम भरते है  सब यहा अपनी दोस्ती का ए दोस्त
कागज़ के जैसे फूल ,पर  खुशबू कोई नहीं
कहते थे  देंगे जान भी दोस्ती की खातिर
तैयार है जनाज़ा पर शामिल कोई नहीं
तंगदिली है वक्त की, मत पूछिए दिल की
दिल दोस्ती पे कुर्बान  ,पर वक्त कोई नहीं
करते हैं  हम सलाम इस दोस्ती को दोस्त 
कहते हज़ारों किस्से है ,हमसुखन कोई नहीं
मत पूछिए अब मायने इस दोस्ती के हमसे
यारों की भरी भीड़ है , पर अपना कोई नहीं

शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

timiron kaa Jhurmut


तिमिरों का झुरमुट 

तिमिरों के झुरमुट ने
सुनी प्रकाश की पदचाप 
उतिष्ठित हुई नवाषा 
ले सुरीला आलाप 
जगमगाए जुगनू 
फैल गया उल्लास 
तिमिरों के झुरमुट में
हुआ रौशन आभास 
कदमो की बढ़त ने 
लिया तम का हवाला 
बेअसर किया चुपचाप 
उदासी का हाला 
दर्द का विष पान 
हुआ पीयूष सा मधुरिम 
जीवन का बुझा दीप 
पुन; हो गया टिमटिम 
अब वक़्त के नगमो ने 
किया गुंजित  मधुमास 
तप्त मरुथल  की भी 
जैसे बुझ गयी प्यास 
खो देगा अस्तित्व 
तिमिरों का यह झुरमुट 
छल्कायेगा गागर 
रौशनी का पनघट 




Ni:stabhdta

नि:स्तब्धता !

नि:स्तब्धता रात्री की
बढती रही
निर्विकार
ढूँढती रही
अपनों को
और कभी
अपनों का प्यार
गहराती जाती थी
उतना ही
संग संग रजनी के
कुछ अनमनी सी
कुछ बेकरार
अध्ययन करती
बेजान चित्रों का
कुछ विचित्र
कुछ निराकार
चिंतन  करती
अनन्य वेदनाएं
कुछ त्याज्य
कुछ का
करती अंगीकार

bachpan aur bachpna

कितने बड़े हो कर हम बच्चे ही बना रहना चाहते है .
शायद जो निश्चलता बाल पन में है वह किसी और रूप में नहीं
और तुसलीदास एक प्रसंग में भगवान का उल्लेख करते हुए कहा है
"निर्मल मन जस सो मोहे पावा , मोहे कपट चल छिद्र ना भावा "
बड़े हो कर भी बचपन में जीने वाला शायद बहुत सुखी रहता है और कभी कभी बहुत दुःख का भागी भी  बनता है
क्योकिं सामने वाला उसके बचपन को उसकी बेवकूफी समझ लेता है . और समझे भी क्यों ना ?
इंसान के व्यवहार से ही तो उसकी उम्र का अंदाज़ होता है और अधेड़ अवस्था में आकर भी बच्चो जैसी हरकते करने वाले
उपहास का पात्र ही बनते है . शायद में  भी उन सब में से  एक हूँ  जो कि उम्र के पचासवे वसंत में पहुँच कर भी एक चोदह साल के बच्चे
की तरह हरकते करती हूँ  . वह भी समझ नहीं पाती थी की क्यों करती है ऐसी हरकते. इतनी बड़ी उम्र , इतनी बड़े पद पर कार्यस्थ , कैसे बेवकूफी  वाली हरकते करती है
कैसे मचल जाती है एक बच्चे  की तरह ,,,,शायद उसे समझना चाहिए और मासूमियत का नकाब उतार हकीकत में आ जाना चाहिए .
जीवन कभी कभी कठिन सा लगने लगता है ..........हम क्या समझ कर कुछ कर देते है और सामने वाला क्या समझ लेता है .......सोचना तो चाहिए ही ना ..........
कभी कभी सोचती हूँ कि जानबूझ कर कुछ ना समझने की कोशिश करती हूँ .........याँ फिर अपनी ही सोच के दायरे में जीना चाहती हूँ जहाँ कुछ सोचना नहीं पड़ता . एक जीवन जीती हूँ बेसोच भरा ....
याँ फिर इतना सोचती हूँ कि सोच की सोच में डूब कर  क्या सोचना चाहिए यह में ठीक से सोच नहीं पाती, और  यही भूल जाती हूँ कैसे सोचा   यह सब ............
लेकिन इतना तो ज़रूर निचित है की हर इंसान को अपने उम्र से साथ जीना सीख लेना चाहिए और बचकानी हरकते छोड़ कर एक समझदारी और परिपक्व जीवन जीना चाहिये., नादानी नहीं करनी चाहिए ख़ास कर उसके सामने जिस को आप बहुत पयार करते हो . क्योकि वह आप को बेवकूफ समझ कर , आपके बचाकने व्यवहार से तंग आकर मजबूरन आप से आलग हो जाता है
बचपन और बचपने  में फर्क समझना बहुत जरूरी है .

सोमवार, 1 अगस्त 2011

taz do ab is jadta ko

 तज दो अब इस जड़ता को

जड़ता की दौड़ में डूबा मन , रिश्तो की भाषा भूल गया
हिंसा प्रति हिंसा की ज्वाला में जल कर अपनत्व को भूल गया
अब भाव कहाँ जो भावो की भाषा को पढना जानते थे
अब राग कहाँ जो सरगम को सुर ताल में करना जानते थे
 डरते है कीट किरीट यहाँ  ,कलरव का  मंजन  करने को
चिड़िया तोता मैना चुप हैं , उन्मुक्त श्वास एक भरने को
अब तोप टैंक बन्दूको पर , जीवन के jगीत सुनाये जाते हैं
जी लेने को मुस्का कर पल दो  , सब  स्वांग रचाए जाते है
निश्चल मन मिलना स्वप्पन हुआ ,रिश्तो की गर्मी दिवा स्वप्प्न
द्वेष चिगारी में जल  भस्म हुआ , और प्रेम आग में   ठंडा पन  ,
निश्चलता ढूँढो अब रिश्तो में , बुनियादी है मानवता की
यह मेल बढ़ाती है दिल के  ,और शत्रु है पाशविकता  की
वक़्त हुआ अब चेतनता का , उठो करो इसका अभिनन्दन
तज कर अब इस जड़ता को  ,   भ्रात्री  भाव का करो आलिंगन