शनिवार, 14 अप्रैल 2012

वक्त कहा है ?

वक्त कहा है ?
नभ पर  चमकते  भोर के तारे ने टिमटिमा कर  सुबह होने का ऐलान किया . उषा की सुनहरी किरन अपना जाल फैलाने को तैयार हो गयी
विहग वृन्द का कलरव उषा गान करने लगा .रात भर शबनम की बूंदों  से भीगी वनस्पतियाँ पुनह अपना रस बरसाने को उद्यत हो उठी .
सब तरफ गतिशीलता नव आवरण ओढ़ गतिमान हो उठी .काल स्वयं नव रथ पर आरूढ़ हो कर भ्रमण करने निकल पड़ा 
जल थल नभ की गतिशीलता जैसे मानव को  उसके  गति हीन होने का एहसास करा रही थी . चाह कर भी आलस्य के चादर से नहीं निकल पा रहा था . वक्त था कि कही थमने का नाम नहीं ले रहा था . सरपट सरपट दौड़ रहा था......आकाश में ...आदि में....अंत में......अनंत में....
और मानव आलस्य के चादर ओढ़े , ऊंघता , सूंघता ,रोता बिलखता और कभी हँसता खिलखिलाता , अपनी खीसे निपोरता बस यही सोचता है और गुहारता है कि "वक्त कहा है "
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शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

दर्द

दर्द

हर दर्द किसी दर्द से बड़ा होता है

दर्द कही है इस का दर्द कहा होता है

ना सोचेंगे तो होगा ना दर्द का दरिया

दिल के किनारों पर ही दर्द जमा होता है

दर्द जो तड़प उठे वोह दर्द कहा है

दर्द ने भी दर्द का हर बोझ सहा है

बह निकला जब तोड़  बाँध दिलों के

दर्द भी दर्द के हर  आंसू में बहा है

जो बात मैं कह दू तो दर्द बने है

जो बात में सुन लू तो दर्द बने है

करे अनुभव जिसे यह दिल वह  दर्द बड़ा है

दिल के किनारों पे तो दर्द खड़ा है





गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

प्रयत्न

प्रयत्न  
शब्दों का कोलाहल लो फिर हुआ मौन
मनघट के देहरी  से यह झाँक रहा कौन
उत्सव है यादों का  अम्बर तक मेला है
शिशिरों  के मौसम में वसंत का रेला है
रह रह कर बहते हैं मुग्ध हए नैन
न्योता है मंगल मय रीझ उठे बैन
किंकिन से नुपूरों की गुंजित मधुशाला है
मन के दौराहे की अब निशित पग शाला है
रुष्ट हुये झंझावात ,दिनकर की शक्ति से
मन के आये मीत जो तुम निश्छल भक्ति से
द्वारों के वन्दनवार कोकिला सजाती है
आस युक्त उत्कंठा दूर खड़ी लजाती है
आये जो अब तो ना जाने पायोगे
मंजिल पर धरे जो पग अब ना लड़ खडायोगे
खोल द्वार प्राची के अरुणिमा सजा लो अब
तप्त सुप्त स्वप्प्नो को फिर से जगा लो अब
गीत मधुर वासंती फिर धरा में गूंजेगे
भागीरथ प्रयत्नों को फिर से सब पूजेंगे


 

रविवार, 8 अप्रैल 2012

हर्ष का शंख

हर्ष का शंख
 
ना बनते है ना मिटते है
ख्यालों के यह बादल अब
ना उमड़ते है, ना झरते है
भावों के यह दरिया अब
सूखा अब  समुंदर है ,
मरू की रेत सा रूखा
बरसता ज्वाल आँखों से
धधकता उर हुआ   भूखा
तड़प की बूँद बाकी है
करती है हवा को नम
गगन के गीत गीले हैं
हैं बोझिल धरा का मन
सच का सत्य है कडवा
कल्पना मौन बैठी है
सृजन की तूलिका का स्वर 
किये अब गौण बैठी है 
सपने में है धुंधला पन 
बहारों को बुलाएगा 
खिलेंगे गुल गुलिंस्ता में 
भंवरा गुनगुनाएगा 
करो अब बात चैती की 
रश्मि पूनम की  छाती है 
करने उर्वरा  मन को
गुलाबी फिर बुलाती है
चलो आओ  मुडेरों पर
सृजन का बीज बो दे हम
जगत हो महकता मधुमास
हर्ष  का शंख गुंजा दे हम

उजले लोग

उजले लोग
उजालों  में जो भटके हैं
अंधेरों  से अब डरते हैं
मिले थे कल वो साए से
अब परछाईं से बचते  हैं
किये थे  दफ़न दस्तावेज़
सितमगर के गुनाहों के
जड़े ताबूत में कीलें अब
मागें हक़ पनाहों के
पुती कालिख स्याही की
नकाब पोशी  सफ़ेदी की
शहंशाह जुल्म के बन कर 
कहलातें है उजले लोग 
 

चुनौती


चुनौती 

कहता जीवन मरना छोड़ो 
अपने आप को छलना छोड़ो 
सांस की आस में धुयाँ हुआ  जो 
उन अनलों में तपना छोड़ो 
कहता जीवन व्यथा है कैसी 
चलती धारा कथा के जैसी 
हर इक अंक का अंत है निश्चित 
रंग मंच के मंचन जैसी 
जीवन का यह  राग पुराना 
गुंजित होता हर लम्हे पर 
चेतावनिया देता रहता यूं 
भूली  धुन का नया तराना 
कहता जीवन जी लो मुझको  
 स्वाति बूँद सा पी लो मुझ को 
पल पल प्रतिपल जो  हुआ असंभव  
 हो अजय तो जीतो मुझको 

रविवार, 25 मार्च 2012

मन की मर्यादा

मन की  मर्यादा
दोस्त दोस्ती और दोस्तों का प्यार ,इन रिश्तो में मायनों की व्याख्या कुछ धुंधली सी होने लगी है .
अभी दफ्तर में हूँ बाद में बात करते हैं.अभी घर में हूँ बाद में बात करते हैं
तो वह बाद आना ही क्यों है जिस को हम सब जगह से छुपा कर रखना चाहते हैं
मित्रता क्या केवल रास्तों की है ?
वक्त के बहाव में कुछ उलझे हुये  जज्बातों की है ?
या फिर उमड़ते विकृत , याँ झंकृत ख्यालातों की है ?
झुझला उठते है प्रशन स्वयं , उत्तर  डरे डरे से हैं
मौन विवादित जिह्वा पर आने को रुके रुके से हैं
स्वीकार करे ना खुल कर जो ,उन रिश्तों का औचित्य है क्या
जग की मर्यादा से भारी मन , मन की  मर्यादा के  मान का क्या ?
रिश्तों में छुपता है उजला पन , उजला धूमिल  निर्ममता से
गर वक्त मिले तो अपना पन ,वरना अनजान अस्थिरता से
क्यों मन अपनाए ऐसे रिश्ते क्यों स्वीकार करे इस जड़ता को
क्यों छिन्न करे मन के सत को ,पा भेद विभेद के चक्रों को