शनिवार, 22 जून 2013

जगत नियंता

जगत नियंता
धरा की बेबसी
 दृगों की व्याकुलता
मन की अकुलाहट
  तन की शिथलता
इन सब अनभिज्ञ
अपने अस्तित्व के
वर्चस्व को
स्थापित करने में
सलंग्न है
और प्रकृति
का क्रोध है
चरम सीमा पर
द्वंद्व में पिस रहा है
जगत !!!!!


रविवार, 26 मई 2013

तपिश

तपिश 


शाम के धुंधलके में 
पहाड़ी के पीछे 
छिपता हुआ सूर्य बिम्ब 
जैसे शर्मिंदा है 
अपनी दिनभर की 
उद्दंडता के लिए 
और पनाह मांग रहा है 
रात के आँचल से 
रजनी जैसे  समा लेती है 
हर गुनाह को अपने आँचल में 
 वैसे ही ढांप लिया है दिनकर को 
 और सूर्य बाट देख रहा है अगले दिन की 
किसी नटखट बालक की तरह 
फिर  करे वही  शैतानी 
और बिखरा दे अपनी तपिश 
चहुँ  ओर !! चहुँ ओर

शनिवार, 25 मई 2013

एहसास

एहसास 

केवल एहसास ही तो है जो जिन्दा रहता है ,अपर्वर्तनीये ...और  कुछ खो कर पाने की प्रबल इच्छा को जागृत करता है .
दो साल पहले अचानक एक दुर्घटना ने जीने के मायने बदल दिए . जीने का ढंग बदल गया . परिवर्तन कुछ इस तरह हुआ की सोच भी नहीं पाए कि समझौता करना है या स्वीकार .
लेकिन एहसास था की कुछ मानने  को तैयार नहीं था . संघर्ष किया और आज पुन्ह जब उगते सूरज के साथ आँखे खोली तो पाया कि एहसास ने फिर विजय पायी और पुन्ह जीवन को जीवंत कर दिया . 
बात बहुत छोटी सी है . खेल के मैदान में पैर मुढ जाने से घुटना क्षति ग्रस्त हुया. इलाज़ चलता रहा लकिन बार बार वाही चोट लगने के कारण चलने फिरने में  रूकावट बढ़ गयी .छोटा सा ऑपरेशन भी हो गया .लेकिन अब ऐसे लगने लगा था की शायद अब कभी जीवन में वो बात न आ पाए . दौड़ना भागना तो दूर  , चलना भो दूभर लगने लगा . चार महीने पहले बचों को चुनौती  दी की गर्मी के छुट्टी में में खेल के मैदान में मिलेंगे और मैच खेलेंगे (बास्केट बाल ) बस जैसे अपने आप से लड़ कर रोज़ अभ्यास करने लगी .एक एक कदम उठाना कितना पीड़ा जनक था हिम्मत भी टूट जाती थी कभी कभी ..लकिन एहसास था के एक दिन जीतना है 
और आज बचों के साथ मैच खेलने के लिए तैयार थॆ. आज यह महसूस हुआ की जो दर्द कभी मेरे जीवन का हिस्सा बन्ने जा रहा था वः सिर्फ घुटने के एक कोने में ही सिमट कर रह गया .
और में उन्मुक्त और पुन्ह एक उत्साहित जीवन की अधिकारिणी बन चुकी थी .



रविवार, 12 मई 2013

लेखन


लेखन 

मंच मेरा और कविता भी मेरी
पर कलम कहाँ  से लाऊँ वह
बोले मेरे अनबोले शब्दों को
वो  स्याः  कहाँ से पाऊँ मैं
गीत छंद मुक्तक और दोहे 
वाणी का बंधन भूल चुके
भाव चुनिन्दा छुप छुप  कर
नैनों के रस्ते फूट चुके
रीते वचन सुमंगल करदे
कैसे मन को  समझाऊँ मैं
पीडित रोदन को सोखित कर ले
 कोई  हर्षित शंख बजाऊं मैं 



मेरी माँ

 मेरी माँ 

कभी जब मन अंधकार में डूब जाता है , 
कभी जब तन थकन से  बोझिल हो जाता है 
कभी जब हिम्मत की नाव हिचकोले खाने लगती है 
तब तब माँ आती है और चुपके से झुके हुए कंधे पर 
अपना प्यार भरा हाथ रख देती है . नव चेतना भर देती है 
और पुन्ह जीने के बहुत से नये आयाम सामने रख देती है 
शत शत नमन माँ . शत शत  नमन !
माँ जो मर कर भी नहीं मरती ....माँ जो सदा अपने आत्मा का स्पर्श  बनाए रखती है ......माँ जो  इस दुनिया में नहीं है तब भी हर पल मेरे साथ है और ....

रविवार, 14 अप्रैल 2013

शहर

शहर  

गुमसुम और चुपचाप शहर 
सुनता अपनी पदचाप शहर 
कोलाहल के संग जीता 
कलरव से  अनजान  शहर  
आशा  के तुतलाते बोल 
संग उम्मीद के बजते ढोल 
ढलते दिन और चद्ती शामे 
जीवन बिम्ब को तुला में तोल 
सूखे भावों में बहे  शहर 
बस अपनी धुन में रहे शहर 
सूनी आँखों से भरे जगत का 
करता अंगीकार  शहर 

शनिवार, 30 मार्च 2013

एक बूँद


एक बूँद  

उन्मुक्त गगन की सरल छाँव में 
हुयी विरल  भावों की वर्षा 
मन मयुर करतल दे नाचा  
बस एक बूँद को चातक  तरसा 
शुभ्र लाज से लाल हुआ  
पीत हुआ मटमैला सा 
 हरा हुआ वासंती सा 
नीला रंग  श्यामल श्यामल सा  
इन रंगों को समझें कितना 
लाल हरे नीले और पीले 
फीके पड़ते जितने भी यह 
मन में गहराते हैं उतना 
सपने बहला जाते हैं मन को 
तृष्णा आ फिर ठग कर जाती 
सच जब आ दर्पण दिखलाता 
बस एक बूँद की चाह तब जगती 
कोरे बंधन कोरी बातें 
चोरी से जगती सब रातें 
तब  एक पल में धूल  में मिलते 
बस  एक बूँद की चाह में जगते 
बूँद जो जीवन दे जाती है 
बूँद जो जीवन ले जाती है 
बूँद जो बूँद बूँद से जुड़ कर 
जन्म मरण सब हर लेती है