मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

आविष्कार करो

आविष्कार करो 

हो अग्रसारित अपने पथ पर 
विचलित न हो कण मन का  
मंजिल पर जब पड़े कदम 
वह मील पत्थर बने  जग का 

तुम चलो ज़माना पीछे चले 
तुम रुको अचंभित हो जग यह 
तुम करवट लो तो उठे बवंडर 
तुम बदलो तो यह जग बदले 

तुम तेज़ धार तलवार सरीखे 
तुम विश्व रचियता नव युग के 
तुम कर्मठता के तेज़पुंज 
कुछ रचो नया कर्तव्य है यह 

पहचानो बल अपने श्रम का 
पुरुषार्थ करो पुरुषार्थ करो 
तुम तकनीकी पारंगत 
कुछ रचो नया ,  आविष्कार करो 







रविवार, 29 मार्च 2015


अपनों ने  छोड़ा
नहीं कभी साथ 
पर जो छोड़ गया साथ। ……
वो कभी अपना
हुआ ही नहीं 


शनिवार, 7 मार्च 2015

महिला दिवस

महिला दिवस


एक इन्सान है हम
सख्त जान है हम
न बांधो शक्ति को
दान दे कर एक दिन का
हर एक दिन को
सशक्त बनाती है हम

न होती गर नारी
न बनता परिवार
न होती गर शक्ति
असंभव  शिव अवतार

मिट जाये धरा गर तो
रोता यह आकाश
तोड़ो भ्रम को कि
यह महिला दिवस है
यह मान लो कि
हर दिन ही बस
महिला का दिवस है

धन्य है वो देश,
वो विश्व ,वो समाज
जहा हर जान सुरक्षित
पूज्य ,गर्वित और करे नाज़





स्वप्पन हुए ख़ाक फिर से सवारूँ कैसे



दिल का दर्द पन्नो पे उतारूँ  कैसे
एक आंसू है उसे हर्फ़   बनाऊ कैसे
जलजले उठते है हज़ारों  दिल में 
हर जलजले को एक मोड दिखाऊँ कैसे

उजड़ा है चमन नीड़ बनाऊँ कैसे
हर तरफ शूल ,गुल को खिलाऊँ  कैसे
रौशनी दूर  चिरागों से जो आती थी कभी
बुझ रही  शमा  , बचाऊँ कैसे

हो गए मद्धम ,बुलंद  इरादों के स्वर
हो गए फीके रंग जो होते  थे अजर
बस अब एक   तमन्ना  बाकी  यारो
स्वप्पन हुए ख़ाक फिर से  सवारूँ कैसे

उठते हैं जो गिर कर ,मज़बूत कदम है
हँसते है जो गम पा  के भी  ,उनमे दम है
देते है हवा  सब को जो ,बनके  पैगम्बर
सम्राट मुक़द्दर  के ,बेताज वो हम है.



















शुभ ,अशुभ

शुभ ,अशुभ



शुभ ,अशुभ का भेद क्या जानो
शुभ है  जो मैं देख रहा हूँ
अशुभ जो मैं  बस सोच रहा हूँ
घटना कुछ भी घट जाती है
चिन्ह बस अपने दे जाती है
उसको अब चाहे जो  समझो




मित्रता की नीँव क्या ?

मित्रता की नीँव  क्या ? 

वैचा रिक मतभेद या वैचारिक समानता 

प्रशन जितना सरल है। उत्तर उतना ही कठिन
उत्तर अगर सहज है। तो प्रभाव उतना ही असहज 
क्या इन्सान की परिपक्वता भी कोई मायने रखती है 
इस तरह तो क्या मित्र का मूल्यांकन भी बदलता रहे गा ?


शनिवार, 1 मार्च 2014

जग समीक्षा

जग समीक्षा

यह जग भले बिसार  दे 
या व्यर्थ की गुहार दे 
ताज सा वोह शीर्ष पर 
बिठा के भी  उतार दे 

न रूकना तुम 
न झुकना तुम 
न मौन दृगों से ताक कर
हृदय से यूं सिसकना तुम 

हाथ श्रम कुठार ले 
वक्त की बयार ले 
अपने मन को बाँध कर 
बस यूं ही आगे बढ़ना तुम 

सराहना  नहीं है माप दंड
निज  प्रयत्न की ,पुरषार्थ के 
पग मंजिलो को चूमते 
साक्षी है परमार्थ के