Srijan
मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013
आज का दिन , जीवन को दे एक नयी प्रेरणा , एक नयी दिशा , एक नयी मंजिल।
खुशियों से भरा यह दिन , यह साल और समस्त जीवन
जन्म दिवस की शुभ कामनाएं। …….
एवं ढेर सारा प्यार। …………।
शनिवार, 14 सितंबर 2013
वक्त
वक्त
वक्त बहता ही रहा
सरहदों को पार करता
बेसबब इतिहास गढ़ता
अनगिनत सुर्ख़ियों पर
बेजुबां परिहास करता
वक्त बहता ही रहा
पकड़ने की कोशिशें
सब धूल में मिलती रही
अपनी ही नाकामियां
पर मुखर होती रही
कर के सिजदा वक्त का
जुल्म यूं सहता रहा
वक्त बहता ही रहा
निष्फल नहीं होते प्रयतन
मंत्र यह बस साथ था
मुश्किलों के दौर में भी
साथ मेरा हाथ था
छू ही लूँगा अब तो मंजिल
पग निरंतर धरता रहा
वक्त बहता ही रहा
चीर कर सीना वदन का
हर कदम आगे बढेगा
यह कभी रूकता नहीं है
वक्त के संग दम बहेगा
ले संबल संकल्प का
कर्म बस करता रहा
वक्त बहता ही रहा
मेरी छाया
बहुत बड़ी है मेरी छाया
मुझसे पहले यह उठ जाती
मुझ से आँख बचा कर
सब से पहले यह आ जाती
बहुत अच्छा लगा तेरा यूं कुछ छोड़ कर जाना
वो आगे बढ़ना फिर पीछे देख कर मुस्कुराना
बढ़ जाता है हर कोई छोड़ कुछ निशाँ कदमो के
उड़े जो धूल तो दूर क्षितिज में रंग बिखर जाना
शनिवार, 24 अगस्त 2013
कोटि धन्यवाद
जन्मदिवस पर शुभकामना देने वाले मित्रों का हार्दिक आभार !
कोटि धन्यवाद !
शुभ कामनायों की यह सौगात
भर गयी मन मैं उल्लास
सच है जीवन का नया वर्ष
करता नव जीवन की शरुआत
कोटि धन्यवाद !
शुभ वचन ,बधाई और सत्कार
मित्रों से मिला असीम प्यार
घोल गया जीवन में रंग
मिटी रार ,मची अब हुडदंग
कोटि धन्यवाद !
रहे साथ तुम्हारा जीवन भर
मिले प्यार तुम्हारा जीवन भर
अहो भाग्य ! है अहो भाग्य !
यह दुलार तुम्हारा सर माथे पर
कोटि धन्यवाद !
मंगलवार, 13 अगस्त 2013
जन्मदिवस की विशेष शुभकामनाएं !!!!
जन्मदिवस की विशेष शुभकामनाएं !!!!
नये साल की नयी सुबह
खुशियाँ लाए भर कर झोली
प्राण दीप से जगमग झिलमिल
प्रशस्त मार्ग ,निष्कंटक जोली
करो मुसकाहट से ध्वस्त विरोध
श्रम से हासिल जीत सुनिश्चित
जगतीतल की विपदायों से
रहो सुरक्षित निर्विरोध
तुम सहज सरल सुंदर हो किंजल
रहो शक्ति मान तुम चिर निरंतर
तुम मुखर रहो,तुम सबल रहो
यह जन्मदिवस की दुआ है तुम पर
शनिवार, 29 जून 2013
अवकाश
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अवकाश
काश! मिल जाती घडी अवकाश की
रूबरू कुछ हम भी होते आराम से
वक्त का पहरा न होता काम पर
मुक्त तो हुए ही होते अवसाद से
तलब यूं आराम की बढती रही
जिंदगी से बेरूखी बढती रही
सांस के घरोंदो में छुपी नन्ही सी जान
बेतक्क्लुफ़ अनंत में उडती रही
यात्रा फिर प्रारंभ हुयी अंतहीन
चर -अचर विचर विचर बना कहर
अवसरों की चाह में जो था विकल
फिर रहा भटकता शाम ओ सहर
कब कहाँ मिल सका कभी अवकाश
कब कहाँ झुक सका यह आकाश
चरैवैत चरैवैत का पढ़ा जो मन्त्र
मिल गया सर्वत्र जीवन का सारांश
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