शनिवार, 19 दिसंबर 2015

अंदाज़ निराला है


वाह रे दोस्त !,तेरा अंदाज़ निराला है
जाने कितने गमो को  सीने में पाला  है

मुस्कानी धागों के वस्त्र बनाता है
जगह जगह  दर्दो पे  पैबंद लगाता  है
दुखों के कैकटस उगा कर मन में
चेहरे पे जूही के फूल खिलाता है

वाह रे दोस्त !,तेरा अंदाज़ निराला है
जाने कितने गमो को  सीने में पाला  है

अस्मानी  रूहों के शख्स बनाता है
तरह तरह नामो के साथ बिठाता है
एक  नाम जो उसकी सांसो में बसा है
हर रूह को उसके साथ मिलाता है

वाह रे दोस्त !,तेरा अंदाज़ निराला है
जाने कितने गमो को  सीने में पाला  है

कशिश


कशिश 

कुछ थी कशिश 
बाकी अभी 
जो बर्फ सी 
जम जाती कभी 
कुछ नमी 
नम कोरों से 
बह कर गर्त 
ले जाती सभी। 

एक कशिश 
प्रयत्क्ष है 
जो गुप्त थी 
एक कशिश 
अवयकत है जो 
व्यकत थी 
एक कशिश 
जो घूमती थी 
दर -ब -दर 
वह कशिश 
स्तब्ध हो 
पुकारती है 

कल भी थी 
कल भी होगी 
कर्ज फर्ज का 
उतारती है 





रविवार, 13 दिसंबर 2015

मित्र के लिए


अपने मित्र आग्रह पर , मित्र के लिए

नूतन से

सुबह  की पहली किरण सी तुम
हमेशा की तरह सुनहरी
अपनी आभ से रौशन करती
मित्र ,तुम कनक समान
पूर्ण पोषित हो..
हर पल एक हर मोती को
गूँथ  लेने को तत्पर
सार्थक करते अपने नाम को
कुछ नूतन करने को उद्यत

जोड़ दिया हर बंधन तुमने
पिरो दिया हर मनका तुमने
तिनका -तिनका जोड़ धरा पर
नीड नया बुन दिया है तुमने




सोमवार, 24 अगस्त 2015

शुभकानायों के लिए.

शुभकानायों के लिए.

व्यस्त दिवस है वक्त कहाँ है मन के भाव पलटने को 
जनम दिवस ? बस दिवस यही है मन के भाव समझने को 
प्रेम सुधा की गागर  जो छलका दी  मन के कोने से 
 मस्तिष्क धरा में   अंकुर फूटे प्रेम बीज के बोने से 
दुआ एक मेरे अपनों ने फिर मेरे ऊपर  बरसा दी 
जीवन हो जीने को उद्द्यत ,ऐसी धारा सरसा दी 
शब्द नहीं अब मेरे कुछ धन्यवाद भी  कहने को 
दवा  नहीं यह एक दुआ  है जीवन  भर सहेजने को 



रविवार, 16 अगस्त 2015

जब रिश्तों का आंकलन कोई अपने  जीवन की सफलता /असफलता के मापदंड के साथ नापने लगता है तो  उसे यह समझ लेना चाहिए कि  वह  अब रिश्तों के परिभाषा से भ्रमित हो चुका है।

शनिवार, 15 अगस्त 2015

विजय गान


विजय गान 

कब जाना कल ढल जाएगा 
जीवन पल में छल  जाएगा 
व्यर्थ रहा गर यह पल प्रतिपल  
 समिधाओं में जल जाएगा 
आयों सम्बल और सजा दें 
दुविधाओं का मूल्य गिरा दे 
संशय सारे होंगे धूमिल 
श्रम से तप का दीप जला दें 
शूल फूल का रहे समंवय  
प्राचीरों से झरे पराजय 
उन्नत नभ की मीनारों से 
विजय गान उद्घोष सुना दे