बदलाव जीवन का !!!
कितनी सरलता से कह दिया हम ने हवायों को
भूले से भी न गुजरे कभी अब वह मेरे आँगन से
यूं कर दिया आगाह हमने इन नभ फिजाओं को
न इठलायें कभी अब वह मेरे मन के उपवन में
बदलते मौसमों का स्पर्श जबरन छू ही जाता है
चाहे रहो संभल कर दूर जीवन की बदलन से
शनिवार, 20 नवंबर 2010
chalo bane anjaan
चलो बने अनजान
रिश्तें बेतकुल्लफ के जिए यूं बहुत देर हम ने
चलो बार फिर से एक हम अनजान हो जाएँ
गुजारें है मधुर वो पल जो साथ साथ हमने
चलो बार फिर से एक वह बस अरमान बन जाएँ
बहा हर आँख से कतरा- ए - शबनम का मेरे ए दोस्त
हम दोनों के एक ख्वाब की पहचान बन जाये
हो जब कभी भी सामना गुजरते यूं दरीचों में
तुम्हारा अक्स मेरे दर्द- ए- जिगर का मेहमान बन जाये
रिश्तें बेतकुल्लफ के जिए यूं बहुत देर हम ने
चलो बार फिर से एक हम अनजान हो जाएँ
गुजारें है मधुर वो पल जो साथ साथ हमने
चलो बार फिर से एक वह बस अरमान बन जाएँ
बहा हर आँख से कतरा- ए - शबनम का मेरे ए दोस्त
हम दोनों के एक ख्वाब की पहचान बन जाये
हो जब कभी भी सामना गुजरते यूं दरीचों में
तुम्हारा अक्स मेरे दर्द- ए- जिगर का मेहमान बन जाये
गुरुवार, 11 नवंबर 2010
stree se
स्त्री से
क्यों बन कर लता
ढूँढती हो
किसी वृक्ष का सहारा
हो स्वयं तरुवर
जुड़ना जिस से चाहे
यह उपवन सारा
क्यों बन लहर
चाहती हो हर पल एक किनारा
हो बल्ग्य इतनी
बहो बीच सागर
बन नील धारा
ना मांगो किरण
तड़प कर यूं
सूर्य से तुम
असमर्थ है वह खुद भी
झेलने को तेजस तुम्हारा
क्यों बन कर लता
ढूँढती हो
किसी वृक्ष का सहारा
हो स्वयं तरुवर
जुड़ना जिस से चाहे
यह उपवन सारा
क्यों बन लहर
चाहती हो हर पल एक किनारा
हो बल्ग्य इतनी
बहो बीच सागर
बन नील धारा
ना मांगो किरण
तड़प कर यूं
सूर्य से तुम
असमर्थ है वह खुद भी
झेलने को तेजस तुम्हारा
Satta ka upbhog
सत्ता का उपभोग
मौन शब्द
हुए स्तब्ध
देख सत्ता
का प्रारब्ध
धन लोलुपता
काम भ्रष्टता
शर्मसार हुई
कर्म महत्ता
शक्ति सुयोग
हुआ दुरप्रयोग
वाह रे रक्षक
कैसा नियोग?
मौन शब्द
हुए स्तब्ध
देख सत्ता
का प्रारब्ध
धन लोलुपता
काम भ्रष्टता
शर्मसार हुई
कर्म महत्ता
शक्ति सुयोग
हुआ दुरप्रयोग
वाह रे रक्षक
कैसा नियोग?
मंगलवार, 9 नवंबर 2010
tumhaari aawaaz
तुम्हारी आवाज़
जैसे दूर पहाड़ी के पीछे
बजती वंशी की मीठी धुन
याँ फिर कमलन दल पर डोलते
मंडराते भ्रमरों की गुन-गुन
जैसे साग़र के सीने से उठे
तरंगों का कोई शोर
याँ फिर नभ में घिरी घटा को
देख कर बोल कोई मोर
जैसे झरनों की झर-झर से
निकला हुआ कोई संगीत
याँ फिर सनन सनन हवाओं का
बजता हुआ कोई गीत
जिसको सुन कर किसी का भी
दिल हो जाये बेकाबू
ऐसा है तुम्हारी
सुरमई आवाज़ का जादू
जैसे दूर पहाड़ी के पीछे
बजती वंशी की मीठी धुन
याँ फिर कमलन दल पर डोलते
मंडराते भ्रमरों की गुन-गुन
जैसे साग़र के सीने से उठे
तरंगों का कोई शोर
याँ फिर नभ में घिरी घटा को
देख कर बोल कोई मोर
जैसे झरनों की झर-झर से
निकला हुआ कोई संगीत
याँ फिर सनन सनन हवाओं का
बजता हुआ कोई गीत
जिसको सुन कर किसी का भी
दिल हो जाये बेकाबू
ऐसा है तुम्हारी
सुरमई आवाज़ का जादू
शुक्रवार, 5 नवंबर 2010
intzaar
इंतज़ार
सपना सजाया मैंने जाने कितनी बार
निष्ठुर जोगी तुम ना आए एक बार
राहों में जूही के सुमन बिछाए
दिनकर की किरणों से रौशन कराये
पलकों से पंथ बुहारा कई बार
रात की मांग मैंने चंदा से सजाई
झिलमिल तारों की चूनर ओढाई
घुंघटा ना खोला ना निहारा एक बार
निश्छल प्रेम की मैंने भसम रमाई
क्यों नहीं तुमने मेरी सुधि पायी
जनम जनम तेरा करूं इंतज़ार
सपना सजाया मैंने जाने कितनी बार
निष्ठुर जोगी तुम ना आए एक बार
राहों में जूही के सुमन बिछाए
दिनकर की किरणों से रौशन कराये
पलकों से पंथ बुहारा कई बार
रात की मांग मैंने चंदा से सजाई
झिलमिल तारों की चूनर ओढाई
घुंघटा ना खोला ना निहारा एक बार
निश्छल प्रेम की मैंने भसम रमाई
क्यों नहीं तुमने मेरी सुधि पायी
जनम जनम तेरा करूं इंतज़ार
सोमवार, 1 नवंबर 2010
bikhre moti chunega kaun?
बिखरे मोती चुनेगा कौन?
बंद पलक जो बुने थे सपने
खुली पलक वह हुए ना अपने
अपनों से अब मिलेगा कौन
टूटे सपने बुनेगा कौन?
कह लेते थे दिल की बातें
आँखों से जब होती बरसातें
अब दिल की बातें सुनेगा कौन?
अश्रु आँखों के पौंछेगा कौन?
जैसे सागर तट पर मोती बिखर गये
वैसे हम तुम दोनों बिछड़ गए
अब बिछड़ों से मिलेगा कौन?
बिखरे मोती चुने गा कौन?
बंद पलक जो बुने थे सपने
खुली पलक वह हुए ना अपने
अपनों से अब मिलेगा कौन
टूटे सपने बुनेगा कौन?
कह लेते थे दिल की बातें
आँखों से जब होती बरसातें
अब दिल की बातें सुनेगा कौन?
अश्रु आँखों के पौंछेगा कौन?
जैसे सागर तट पर मोती बिखर गये
वैसे हम तुम दोनों बिछड़ गए
अब बिछड़ों से मिलेगा कौन?
बिखरे मोती चुने गा कौन?
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