मंगलवार, 6 सितंबर 2011

क्या तुमने मेरे स्वप्प्न पढ़े हैं ?

क्या तुमने मेरे स्वप्प्न पढ़े हैं ?
मेरी बातों का भोला पन
भले  साहस का प्रमाण नहीं है
मेरी शक्ति और क्रिया कलाप की
शायद तुम को पहचान  नहीं है
रक्त दौड़ता है जो  धमनी में
उसमें उबलता तेज़ स्राव है
मन में मृत हुये जो सपने
उन में अभी बची  श्वास है
फूँक फूँक कर पग धरता जो
ऐसा समझ ना लेना अग्रज
सिर पर पहन केसरिया बाना
हूँ बन्दा बैरागी का वंशज
केवल गीत नहीं बेचे हैं मैंने
भावों को नहीं हर दम बोला
कर्तव्य निष्ठ और परायणता से
संकल्पों को मन में तौला
मत जग की बात करो मुझ से
मैं तो बस इतना जानू
कर्म मंच है यह जग जीवन
कर्म योग को मैं मानू
लिखे स्वाप्न जो मनस पटल पर
अभिलाषा  के स्याही कलम से
लक्ष्य शिला पर रहे गढ़े हैं
क्या तुम ने मेरे स्वप्पन पढ़े है ?

adhbhut darshan

अध्भुत दर्शन

चलो  छोड़ो जख्म पुराने सब
कुछ नये पन का एहसास करे
छोड़ कर  भूली बिसरी बातें
नव रस गीत गुंजार करे
वादे की ना कुछ बात करो
यह बात नहीं अब बहलाती
जो ना  हो पाए  जग संभव
वह मन को पीड़ा  दे जाती
देखो मौसम भी बदल रहा
यह प्राकृतिक नियम अटूट
सब  कुछ बदला करता है
 मैं और तुम क्यों रहे अछूत
परिवर्तन भी होता परिवर्तित
अजब काल के लेख लिखे
भाग्य की चूनर  रंगत बदले
परिवर्तन के बोल कहें
लो रंग सजा लो फिर उर में
फिर होगा जीवन सहज सुखद
वादों की टूटी कड़ियों में
जुड़ जाएगा अध्भुत दर्शन

शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

Jindagi

जिंदगी
देखा है  मैंने तुम्हे किसी  मोड़ पर
खड़े बेबसी में पुकारते हुये
त्रिन-त्रिन जोड़ कर नीड़ बनाते हुए
तेज़ हवा को एक क्षण में
उस नीड़ को बिखराते हुए
पैबंद लगे घागरे को
बूढी झुकी कमर पर लदे
सड़क पर कंकर  चुनते हुये
धंसी पीली आँखों को
किसी बचपन के साथ
भीख मांगते हुये
फिर भी तुम
कितनी हसीन हो
क्षण भर में बिखरे नीड़ को
इकट्ठा करती हो
बूढी झुकी कमर के
घागरे में आशा का
एक और पैबंद
जोडती हो
बुझी निराश पीली आँखों को
सपनो से भर  देती हो
और !!
बहारों के गीत गुनगुनाते
नये मोड़ की तलाश में
आगे बढ़ जाती हो !!
जिंदगी , ओ जिंदगी !
तुम कल्पना हो किसी कवि की
प्यार हो  किसी प्रेमी का
श्रद्धा हो, किसी पुजारी की
विश्वास को किसी भक्ति  का
उमंग हो मेरे बचपन की
महक हो मदमाते यौवन की
अनुभव हो बूढ़े सपनो का
लक्ष्य हो जीवन साधनाओ का
देखा है मैंने तुम्हे
हर मोड़ पर रंग बदलते हुये
कुछ मीठे और कुछ कडवे
पलों के निशान छोड़ते हुये 



गुरुवार, 1 सितंबर 2011

Niyati

नियति

अश्रु रहित वेदना
ले गयी हर चेतना
बहा भावों का मवाद
कैसा अजब इत्तफाक
हो कर हतप्रभ , अवाक
किया भाग्य से संवाद
क्या यही था झेलना ?

करे सागर हिल्लोर
पीड़ा का नही छोर
किया नभ ने प्रलाप
छेड़े सरिता अलाप
बहा झर झर राग
हुआ मन में मलाल मृत सुर, लय, ताल
क्या यही समर था छेड़ना ?

पड़ी धरा पर छाया
नन्हा फूल मुस्काया
लगे साल या महीना
चीर धरती का सीना
लेकर बड़ी नाजुक काया
नव अंकुरित हो कर मैं आया
यहीं था मुझे खेलना !!!!!

mulyakan

मूल्यांकन
क्या कर पाओगे मूल्यांकन ?
लोलुपता और तानाशाही का
जब ओढ़े बैठे हो आवरण
गिने पाप तुमने पोरों पर
करी झूठ  और झूठ  की गिनती
वचन भरा मिथ्या असत्य का
और सुनी मक्कारों की  विनती
अपनाया "विष कुम्भं पायो मुखं "
क्या कर पायोगे मूल्याकन ?
भ्रष्टाचार की भस्म रमाई
सुमति-कुमति की दशा भुलाई
रिद्धि -सिद्धि और कुख्याति का
ना कर पाए ठीक चयन
लिया सदा सच का दमन
क्या कर पाओगे मूल्यांकन ?
सर्व विदित है जगत में उक्ति
झूठ उड़ा बिन पंख अयुक्ति
धीरे चलता है सत्य का ध्योता
पर सच जगती पे बेफिक्र है सोता
अल्पाऊ है झूठ का वाचक
दीर्घायु है सत्य का वाचाक
हो निराधार इस का वरण
क्या कर पायोगे मूल्याकन ?


Toota kinaaraa

टूटा किनारा
मैं!!!! टूटा किनारा
एक ऐसी  नदी का
जिस का पानी सूख चुका है !
बिलकुल ऐसे .. जैसे
मानव
मानवता सा रूठ चुका है !
याद करता हूँ उछाल
जब भी उस बहते पानी का
तो अब भी भीग जाता हूँ
धारा मैं बहता बहता
कुछ कुछ रीत जाता हूँ !
रूक जाता था हर राही
देख मुझे मुस्काता था
बैठ किनारे ठंडी छाह मैं
क्लांत मन को सुस्ताता था .
अब मैं विलग हुआ जननी से
अस्तित्व हुआ मेरा मलीन
वो हास-परिहास ,वो कल-कल
इन सब से हुआ जीवन विहीन
नभ पर देखा करता हूँ मै अक्सर
उड़ते बेपर बादल के टुकड़े
भिन्न-भिन्न मुद्रायों में ढलते
बेपरवाह सब क्रीडा करते

देख शुभ्र शुष्क और रूखे बादल
शंकित मन में  प्रशन है उठता
औचित्य है क्या इनके अस्तित्व का
अंतर्द्वंद से उलझन करता
इस सूखे पन से क्या रिश्ता है
मेरा और इस शुभ्र  बादल का
एक धरा पर बेबस लेटा
एक उन्मुक्त है विचरण करता
ठहर गया जो जीवन ठहरा
चलंत हुआ तो जगत रुपहला
चल अचल के भाव को पढ़ कर
वक़्त की गिनती गिना करता हूँ
मैं!!!! टूटा किनारा
एक ऐसी  नदी का
जिस का पानी सूख चुका है !



jaroori to nahi

ज़रूरी तो नहीं

प्यार के बदले में प्यार मिले
यह ज़रूरी तो नहीं
हर रूह में भगवान मिले
यह ज़रूरी तो नहीं
नियति में परिवर्तन
महज़ इत्तफाक है
हर इत्तफाक में वही
नियति मिले
यह ज़रूरी तो नहीं
चल दिया कोई साथ
बस दो कदम
यह उसका एहसान है
रख सको गर
संजो कर इसे तो
यह तमाम उम्र की
मुस्कान है
बीते पल गुज़री घड़ियाँ
पुनह दोहरा पायें
यह ज़रूरी तो नहीं
घड़ियाँ पुनह लौट आयें
यह ज़रूरी तो नहीं
ढलती धूप में भी
सुमन खिलते देखे हैं "नीरज '
खिलती धूप में सब खिल जाए
यह ज़रूरी तो नहीं