शनिवार, 10 दिसंबर 2011

अलफ़ाज़ देते रहे आवाज़

अलफ़ाज़ देते रहे आवाज़

खामोशी सर्द कोहरे की  तरह जीवन में उतरती रही .साथ चलती दो रेल  के पटरियों की तरह हम एक दूसरे को  देखते साथ साथ चलते रहे .
नयन अचंभित,विस्मित हुये अपलक पथ को निहारते थे .रास्ता बहुत  लम्बा हो चला था . कुछ बुदबुदाहट स्वत:ओंठो से प्रस्स्फुटित हो जाती.
ख्यालों का ठंडापन स्नायु तंत्र को  शिथिल कर  देता था . दूर कच्चे घरों से निकलता आग का धुया कही कही जीवन चिन्ह छोड़ जाता था .कभी कभी चंद अलफ़ाज़ कुछ आवाज़ दे जाते थे .....बुला जाते थे.....सहला जाते थे ......यादो के रूख को एक नया मोड़ दे जाते थे .....तब दूर नभ पर चमकता  अपनी अरुणिम आभा बिखराता सूरज भी दर्शन दे कर सारी बर्फायी  को अपने आगोश में छुपा लेता था ..आवाज़े एहसास में बदल जाती थी ...और कच्चे घरो से निकलता धुयाँ अब अपने साथ स्वादिष्ट खाने की महक लिए फैल जाता था ..............
 दैनिक दिनचर्या अपना किर्यान्वित रूप धर कर पिशाच  सी फैल जाती है ....बहुत लम्बा दिन...एक बोझिल सा दिन धीरे धीरे सरकने लगता है .
मुस्तकबिल तक पहुँचने के अथक कोशिश .......दूर करती है उसे अपने ही इरादों से ..............चौंक जाता है अचानक लगी ठोकर से .........फिर बढ़ता है ..बड़े बेमन से .......बड़े बेढब से .......बार बार दिनकर के रथ मैं जुटे घोड़े की चाप सुनता है और नपे हुये कदमो को गिनने को कोशिश करता है और फिर उंगलियों पर हिसाब करता है बाकी  बचे पगों का ,  जो अभी नापने शेष है ...........और वह फिर इंतज़ार करने लगता है रात होने की ....
जीवन चक्र है ..चलता रहे गा......  कुछ अलफ़ाज़ बस यूं ही आवाज़ देते रहेंगे ......शिथिल स्नायु तंत्र में प्राण फूंकते रहेंगे

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

प्रियतमा निराशा थी

प्रियतमा निराशा थी

उदासी की महक
रात भर आती रही
दिल के उपवन से
निशिगंधा ने जाने
अंसुवन पान किया !!

लौट चली हवाए
दे कर दस्तक दर पर
आज फिर किसी सौदाई ने
डूबती तन्हाई का
ऐलान किया !!

बनते  रहे ख्वाब
मिट मिट  कर जाने कितने
बिखरते शिशिर  ने
महकते मधुमास का
आह्वान किया !!

चहचहा उठे दीवाने
शजर पर परिंदे
 अलबेले मौसम ने
तडपती सदा का
भुजपाश  किया !!

प्रियतमा निराशा थी
पौरुष  था प्रियतम
आश दीप जल उठे
जब प्रियतम ने
बिलखती प्रियतमा का
अंगीकार किया !!!

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

जल कण

जल कण
श्यामल सी संध्या की
कुंतल केश राशि से
झरते हुए जलकण
भीग गया मेरा
सब तन -मन
नयनो के कोरों पर
रूक जाते स्फटिक से 
भावों की उद्विग्नता से
विचलित हो मन
प्लावन है जल का
चहूँ और मंडल पर
भूल गया सुध-बुध
जल प्लावित मन
रूठ गया मन का मीत
नम है धरा नम है गीत
तड़प उठे बार बार
भाव विहल मन














एक आभास !!



एक आभास !!
जिस का प्रकाश
नयनों के कोरो पर
पारा  बन कर
अटक  जाता है

एक आभास !!
जिस का एहसास
मन की देहरी पर
रंगोली बन कर
सज जाता है !!

एक आभास !!
जिस का विकास
जीवन की चौखट पर
जीवन बन कर
जड़ जाता है !!!

एक आभास !!
जिसका प्रवास
रात के उजालों में
छाया बन कर
घर कर जाता है

बर्फानी सर्द रातों में
गुस्सिली गर्म शामो में
तूफानी बरसातों में
अटल सा अड़ जाता है
एक आभास !
सिर्फ एक आभास !!!

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

अबूझा दिनकर

 अबूझा दिनकर

एक अबूझा दिनकर है
ख्वाबो में खूब चमकता है
मिल जो  जाए धरती पर
अंधेरों में जा छिपता है
बेताब उमड़ता रहता है
मन की भाषा पढने को
दिख भी जाए दो शब्द नये
अपलक निहारा करता है
मौन मुखरता रहता है
लम्हा-लम्हा यूं सिमटा सा
पाने को स्नेह-सिक्त दो बोल
हर वेदन  को वह सहता है 
पीड़ा की तारों से गुंजित
वह अभिव्यक्त ,अभिलाषी
अपने ही तम को हरने को
वह एक रश्मि का प्रत्याशी
मत जी का जंजाल करो
उलटे सीधे न सवाल करो
उसका तेज़ चमकने दो 
अबूझे  को स्वीकार करो

गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

जख्म हरा हरा सा है

 जख्म हरा हरा सा है 

यह दर्द भरा भरा सा है
 यह जख्म हरा हरा सा है 
यह गीत अधूरा अपना है
कोई सोज़ भरा सपना है
चुभते थे लफ्ज़ जमाने के
उभरे थे हर्फ़ अनजाने  से
लौ शम्मा की तडपाती थी
जलते परवाज़ परवाने के
बन कर आता था मीत कोई
चल चार कदम संग बैठ गया
अपने दर्पण में जकड  मुझे
समझ चित्र दीवार पे टांग गया
है कौन समझ पाए मन को
अब  कौन समझाए उस जन को
खोल अपने मन के भेदों को
प्रेम  के बंधन  तोड़ गया



दास्ताँ- यह जीवन की

दास्ताँ- यह जीवन की

चलो छोड़ो ,रहने दो
दास्ताँ- यह जीवन की
कही हमने  ,सही हमने
दास्ताँ- यह जीवन की
मिले जब थे ..सिले लब थे
अधूरी ही रही अब
दास्ताँ- यह जीवन की
हाशिया जब खींच डाला
दिल के पन्नो पर
बने, बिगड़े ,याँ सिमट जाए
दास्ताँ- यह जीवन की
कट गयी है आधी ,
बाकी भी गुज़र होगी
पूरी हो ही जायेगी
दास्ताँ- यह जीवन की
मिले बिछड़े ,मिले बिखरे
धारे मिल ही जाते हैं
धारा की रवानी है
दास्ताँ- यह जीवन की