शनिवार, 28 अगस्त 2010

Udaasi Ki Fitrat

उदासी की फितरत

उदासी कर गयी हर वर्क पर यूं दस्तखत
बहार सी रूह भी पतझर बन गयी  यारो
ख़ुशी ना दर कभी आयी मेहमान बन कर भी
रस्म-ए-मेहमानवाजी  भी बिसर गयी यारो
ना करो अब दवा इस मर्ज़ उदासी का
उदासी  की फितरत ही बन गयी यारो

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

ek vyktitv

एक व्यक्तित्व

एक व्यक्तित्व
  उजला-उजला सा
     रहस्य सरीखा
      खुलता-खुलता  सा
दिन चढ़ता तो ,दिनकर जैसा
तेज,  प्रतापी, प्रबलकर वैसा
है उन्नत भाल
भुज विशाल
तुरग चाल
स्वछंद मुखर
मुस्कान अधर
दिन भर रहता ,बिलकुल व्यस्त
शाम ढले , सूर्य होता अस्त
तो बन जाता बिलकुल  चंदा सा
मृदु कोमल ठंडा ठंडा सा
उसकी कंठ मिठास
देती दिलासा
और विश्वास
वह कल भी था , आज भी है
और कल भी रहेगा
मेरे आस-पास !!!!!!
एक व्यक्तित्व

बुधवार, 25 अगस्त 2010

batlaaye kaun

बतलाये कौन?

बेचैन हैं उनसे मिलने को
         यह उनको जा बतलाये कौन
             एक दर्द छिपा है सीने में
                  यह उनको जा दिखलाए कौन ?
मेरे शहर के लोगों का  अब
      तारुफ़ हैं मेरी तन्हाई से
           ना करदूं सिजदा बेबस हो  कर
                वाकिफ है मेरी रुसवाई से
एक कसक सी  उठती है सीने मे
अब उनको जा समझाए कौन?

समझ दीवाना छोड़ दिया है
      मेरे शहर के लोगो ने
          उल्फत में भी जी लेता हूँ
                  मान लिया है लोगो ने
अब सुर्ख आँखों के सबब को
पूछे कौन ,बतलाये कौन ?

koyee sath nahi deta

कोई साथ नहीं देता

अब गम भी साथ नहीं देता
   हम जैसे गम के मारों  का
        कोई मर्ज़  भी साथ नहीं देता
               हम जैसे दर्द के मारों का
माझी भी  साथ नहीं देता
   हम जैसे मझधारो का
       दरिया भी साथ नहीं देता
          हम जैसे टूटे दश्त किनारों का
मधुबन भी साथ नहीं देता
     हम जैसे पतझारों का
            अपना गाँव नहीं बसता
                  हम जैसे बंजारों का
जाने वालों की क्या चिंता
         आने वाले की फिक्र करे कोई
                 अब रोक लिया है मार्ग
                        किसी ने आती हई बहारों का

Shubh kaamnaayen

शुभ कामनाएं

बन  राज हंस, जीवन सरिता पार करो तुम
बन दीपक  इस जग तम का नाश करो तुम
मानवता के बन कर सजग प्रहरी
मानव  का कल्याण करो तुम
बन मेहा उल्लास का बरसो आँगन में
बन नेहा परिहास का झांको चिलमन से
बन सुमन कचनार की महको उपवन में
बन वसंत बयार कि  गुजरो मधुबन से
हो पर्वत की तुहिन श्रृंखला आसमान को छू कर आयो
हो दानिश, कि भेद क्षीर-नीर का कर   पायो
बढे सामर्थ्य तुम्हारा कि दिन-ओ-दिन  करो तरक्की
करे कामना यही कि ईश दे तुम को शक्ति

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

Rone walon se

रोने वालों से

रोने से मिल जाती अगर मंजिल
तो आज एक दरिया आंसू का मेरा भी होता
रोने से कट जाता कठिन सफ़र यूं
तो शबनम के हर कतरे पे मेरे आंसू का निशां होता
यूं रोने से बदल जाता नसीबा अगर
रो- रो कर मैंने भी हाल बेहाल किया होता
ऐ रोने वाले! समझ ले तू मर्म रोने का
पछताए गा वर्ना कि सिवा रोने के कुछ और किया होता

kha do sab se

कह दो सब से

कह दो ! इन घटाओं से
     नभ में छा जाएँ
          फिरोजी आलम  बनाए
कह दो ! इन हवाओं से
       मस्त सन सनाएँ
          नया सरगम बनाएं
कह दो!  इन बहारों  से
      कोई गीत गुन गुनाएं
              उत्सव मनाएं
आयी शुभ वेला है
    संग उत्साह अलबेला है
        होने को स्वयं सिद्ध
             कोई चल पड़ा अकेला है