गुरुवार, 29 सितंबर 2011

जीवन !!!

जीवन !!!
तमस घना चहुँ और है छाया
विपदा का आँचल लहराया
आशा का अब कहीं छोर ना !!

अंतस का मुख है कुह्म्लाया
पीड़ा  का कुहास है आया
कतरा कतरा बहे वेदना !!

जीवन भी है अजब सी  माया
छलने को फिर छलिया आया
पांखुर जैसे झरे चेतना !!

अंधियारे पथ को उजलाया
कर्मठता का पथ सुलझाया
जीवन जैसे व्यर्थ रहे ना !!

विश्वासों को दीप जलाया
मन मंदिर में तुझे बिठाया
 तिमिर रहे चहुँ और ना !!

ख्वाब कहाँ लिखे जाते हैं ?


कुछ अनघड कुछ  वैताली से
कुछ सूखे ,कुछ हरियाली से
कुछ सच्चे कुछ महज ख्याली से
कुछ भरपूर और कुछ खाली से
ख्वाबो की जागीरों वाले
केवल मुझको यह बतला दो 
ख्वाब कहाँ लिखे जाते हैं ?
सूखा पनघट ,गीला मरघट
मृत हुई आशा का जमघट
ढहते महल देखे ख्वाबो के
कुम्लाया मुरझाया अमृतघट
सत्य लेखनी से गर लिखू
सत्य कहूं तो लिखा ना जाए
सत्य्निष्ट के लेख पढूं तो
लिखे ख्वाब  धूमिल पड़ जाए
हार सत्य और विजय झूठ की
झुठला जाती भागीरथ प्रण को
ख्वाब बने और टूटा करते जैसे
 लहरे निगले  किसी रेत के घर को
ख्वाबो की जागीरों वाले
केवल मुझको यह बतला दो 
ख्वाब कहाँ लिखे जाते हैं ?

और बस्ती जलती रही....

और बस्ती जलती रही....
बेजान पत्थरों का शहर
कोई मूक आवाज
जोर जोर से चिल्लाती रही
लौट कर आती थी
हर आहट और कर जाती थी
आहत दिल को
तेज़  हवा
बुझती राख में
चिंगारी सी भरती रही
और बस्ती जलती रही
भर जाता था  कोई
हरे हरे जख्मो को
हरा कर जाता था  कोई
भरे हुये जख्मो को
शबनमी मुस्कान
रात  भर उस आग को
ठंडा करती रही
और बस्ती जलती रही 

यादे तो कोरा दर्पण है

यादे तो कोरा दर्पण है
तेरी याद का हर लम्हा
जब जब बोझिल लगता है
आँखों से आंसू बहते हैं
दिल कतरा कतरा गिरता है
सब आवाज़े गूंगी लगती है
बहरा हो जाता कोलाहल
बिरहा से  रीते पल पल में
इक आस का दीपक जलता है
रात की डोली में सज कर
जब याद दुल्हन सी आती है
अरमानो की भरी मांग
अंगडाई ले कर जगती है
यादे जीवन को उदास करे
यादे ही मन में उल्लास भरे
बन बन कर उभरे बहुरूपी
यादो से और भी प्यास बढ़े
यादे तो कोरा दर्पण है
एक अक्स दिखाया करती हैं
यथार्थऔर कल्पना के मध्य
इक संतुलन बनाया करती है

सोमवार, 26 सितंबर 2011

चन्दा से


चन्दा से 

चलो   हम भी जागे संग तुम्हारे 
विभावरी के कयी  रूप निहारे
देखे  निशि कैसे करे थिथोली 
तारा  गन की नयन मिचोली 
मादक निषिगन्धा की खुशबू 
संग लिये अपना हम जोली 
कैसे विरह संजोग को तरसे 
बिन बादल पानी जो बरसे 
मौन रागिनी करती  गुन्जन 
जब् आती शब् नम की टोली
लहरे हो जाती उच्श्रिन्खल् 
तोड् किनारे बाहर आती 
शङ्ख सीप मोती और कच्हप्  
करे अमर्यादित सागर की बोली
कही बाल निशा भूखी भी सोती
 रजनी तम की काली में रोती
कभी रात्रि बनी विकराल भयन्कर
कही सहम थिथक जाती स्वयम्भर् 
कभी करती मन की बाते चुपचुप्
और बेबाक स्वर् की कभी बोली 
चलो हम भी जागे संग तुम्हारे 
विभावरी के कयी  रूप निहारे

बाढ़ का प्रकोप

 बाढ़ का प्रकोप

धुलता रहा दर्द आंसूओ के धारा में
भीगता रहा मन जबकि था किनारे पर
जज़्ब बादल से बनते रहे बिगड़ते रहे
खामोशियों से हर सितम सहते रहे
कट गये थे पंख उस उमंग के ,मुस्कान के
जो की उडती थी कभी स्वछंद मन आस्मां पे
आश का हारिल भी सहमा सा नज़र आता है अब
दब गये  प्रयत्न सब वहशत के कब्रिस्तान में
हो गयी जल मग्न धरती , जल के उफनते भाव से
सो रहा है कर्णधार ,अपनी सुखों के नाव मैं

शनिवार, 24 सितंबर 2011

अपने अपने अजनबी

अपने अपने अजनबी

कौन तुम
बड़े पहचाने से लगते हो
धरती पर उतरे हो
आफताब से
याँ कल्पने के नभ पर
महताब से लगते हो
अनल में शीतल से
और शीतलता मैं
अंगार से दहकते हो
आरोह बन राग की
सरगम बनाते हो
और बन कभी विवादी स्वर
सबसे अलग हो जाते हो
पा कर तन्हा मुझे
झट मन आँगन में आ जाते हो
निरख भीड़ लोगो की
मुझे तन्हा छोड़ जाते हो
महकते  उपवन का हो सुमन
या उम्मीदों से महका हो चमन
मरूथल का शूल हो
जो देता मीठी सी चुभन
या मृग मरीचिका हो मरू की
जो आर्द करती मन नयन
भिन्न राहें ,भिन्न मंजिल
भिन्न है अस्मित वजूद
दूरियां हैं मीलो की
पर फिर भी तुम
कितने करीब
कौन तुम
बड़े पहचाने से लगते हो